

नई दिल्ली। डूंगरपुर। बांसवाड़ा।
लोकसभा में शून्यकाल के दौरान बांसवाड़ा-डूंगरपुर– सांसद राजकुमार रोत ने देश के पाँचवीं अनुसूची वाले 10 राज्यों के अनुसूचित क्षेत्रों में शहरी निकायों के विस्तार को लेकर सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारियों पर गंभीर सवाल खड़े किए। सांसद ने कहा कि संविधान का अनुच्छेद 244(1) और पाँचवीं अनुसूची कोई सामान्य प्रावधान नहीं, बल्कि आदिवासी समाज के ऐतिहासिक संघर्ष और बलिदान की देन है।
उन्होंने सदन का ध्यान दिलाया कि संविधान स्पष्ट करता है कि अनुसूचित क्षेत्रों में नगर पालिका, नगर परिषद या UDA जैसे शहरी निकायों का गठन सामान्य प्रक्रिया से नहीं किया जा सकता। ऐसी किसी भी व्यवस्था के लिए संसद द्वारा विशेष कानून बनाना अनिवार्य है, ताकि आदिवासियों के अधिकार, संस्कृति और स्वशासन सुरक्षित रह सकें।
सांसद ने याद दिलाया कि वर्ष 2001 में “नगरपालिका (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) विधेयक” राज्यसभा में पेश किया गया था और स्थायी समिति ने 2003 में अपनी रिपोर्ट भी सौंप दी थी, लेकिन सरकारों का आदिवासियों के प्रति रवैया ठीक नहीं एव राष्ट्रीय पार्टियो में आदिवासी हितैषी मजबूत लीडरसीफ़ नहीं होने के कारण 26 वर्ष बीत जाने के बाद भी सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस कदम नहीं उठाया। उन्होंने इसे आदिवासी समाज के प्रति गंभीर संवैधानिक उपेक्षा बताया।
सांसद ने कहा कि इस लापरवाही का सीधा असर पाँचवीं अनुसूची वाले राज्यों में देखने को मिल रहा है, जहाँ शहरीकरण के नाम पर आदिवासियों की जमीन, घर और आजीविका छीनी जा रही है। विशेष रूप से उदयपुर UDA, डूंगरपुर और बांसवाड़ा जैसे क्षेत्रों में हजारों आदिवासी परिवार इस असंवैधानिक विस्तार से प्रभावित हो रहे हैं।
उन्होंने सरकार से मांग की कि मेसा कानून को शीघ्र पारित किया जाए और जब तक यह कानून नहीं बनता, तब तक अनुसूचित क्षेत्रों में नगर निकायों के किसी भी प्रकार के विस्तार पर तत्काल रोक लगाई जाए। सांसद के इस हस्तक्षेप को सदन में आदिवासी अधिकारों की संवैधानिक रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण और गंभीर प्रयास के रूप में देखा जा रहा है, जबकि सरकार की लंबे समय से चली आ रही चुप्पी पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं।



